भद्रा क्या है?
भद्रा का वर्णन हिन्दू धर्मशास्त्रों में एक अशुभ काल के रूप में किया गया है, जो विशेष रूप से शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित मानी जाती है। ज्योतिषशास्त्र में भद्रा को ‘विष्टि करण’ भी कहा जाता है, और यह पंचांग के महत्वपूर्ण घटकों में से एक है।
भद्रा का जन्म सूर्यदेव और उनकी पत्नी छाया के गर्भ से हुआ। वह शनिदेव की बहन मानी जाती है और अपने भयंकर स्वरूप के लिए जानी जाती है। भद्रा को काले रंग की, लंबे बालों वाली, विशाल दाँतों वाली और अत्यंत भयानक बताया गया है। जैसे ही वह जन्मी, उसने संसार में उपद्रव मचाना शुरू कर दिया और यज्ञ, उत्सव तथा मांगलिक कार्यों में विघ्न डालने लगी।
भगवान ब्रह्मा ने भद्रा को नियंत्रित करने के लिए उसे आदेश दिया कि वह विशेष करणों के अंत में निवास करे और केवल उन्हीं कार्यों में विघ्न डाले, जो भद्राकाल में किए जाएं। हालांकि, उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि भद्रा के दौरान देवता और असुर उसकी पूजा करेंगे और उसका सम्मान करेंगे।
भद्रा का जन्म और स्वरूप
भगवान श्रीकृष्ण ने महाराज को भद्रा के जन्म की कथा सुनाई है।
भद्रा का जन्म: भद्रा भगवान सूर्यनारायण और उनकी पत्नी छाया की पुत्री थीं।
रूप और स्वभाव: भद्रा का रूप अत्यंत भयानक था। उनका वर्ण काला, बाल लंबे और दाँत बड़े थे।
कार्य और स्वभाव: भद्रा के जन्म के तुरंत बाद, उन्होंने संसार को पीड़ा पहुँचाना शुरू कर दिया। वे यज्ञों, उत्सवों और मंगल कार्यों में बाधाएँ डालने लगीं।
इस भयानक स्थिति को देखते हुए, भगवान ब्रह्मा ने भद्रा को आदेश दिया कि वे विशेष समय में उपस्थित रहें और केवल उन्हीं कार्यों में विघ्न डालें, जो भद्राकाल में किए जाएं।
ब्राह्मा जी ने कहा:
"भद्रे! तुम वव, बालव, कौलव आदि करणों के अंत में निवास करो। जो भी व्यक्ति भद्रा के समय में यात्रा, प्रवेश, मांगलिक कार्य, खेती, व्यापार या उद्योग करेगा, उसमें तुम विघ्न उत्पन्न करोगी।"
साथ ही, उन्होंने यह भी निर्देश दिया कितीन दिन तक भद्रा किसी भी प्रकार की बाधा नहीं डालेगी, लेकिन चौथे दिन के आधे भाग में देवता और असुर उसकी पूजा करेंगे।
भद्रा की स्थिति और प्रभाव
भद्रा एक विशेष समय होती है, जिसका अलग-अलग स्थानों पर भिन्न प्रभाव पड़ता है। इसे शरीर के विभिन्न भागों में विभाजित करके दर्शाया गया है:
मुख में भद्रा - कार्य नष्ट हो जाते हैं।
कंठ में भद्रा - धन की हानि होती है।
हृदय में भद्रा - जीवन पर संकट आ सकता है।
नाभि में भद्रा - कलह और अशांति उत्पन्न होती है।
कटि में भद्रा - आर्थिक नुकसान होता है।
पुच्छ (पुंछ) में भद्रा - विजय और सफलता प्राप्त होती है।
इसलिए, भद्रा के प्रभावों को जानकर ही किसी भी शुभ कार्य को करने की योजना बनानी चाहिए।
भद्रा के 12 पवित्र नाम और उनकी महिमा -भद्रा के 12 नामों का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है, जो उसके विभिन्न स्वरूपों और प्रभावों को दर्शाते हैं:
धन्या
दधिमुखी
भद्रा
महामारी
खरानना
कालरात्रि
महारुद्रा
विष्टि
कुलपुत्रिका
भैरवी
महाकाली
असुरक्षयकारी
कहा जाता है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल इन 12 नामों का स्मरण करता है, वह समस्त रोगों और बाधाओं से मुक्त हो जाता है। ग्रह दोष भी शांत हो जाते हैं और व्यक्ति अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करता है।
भद्रा पूजा की विधि-यदि भद्रा के अशुभ प्रभावों को दूर करना हो, तो विशेष पूजा और हवन करने का विधान है।
भद्रा के 12 नामों से 108 बार हवन करें।
हवन के बाद तिल और पायस (खीर) से ब्राह्मण को भोजन कराएं।
मौन रहकर तिल मिश्रित भोजन (कृशरान्न) करें।
अंत में भद्रा देवी की स्तुति और प्रार्थना करें, जिससे उनके अशुभ प्रभाव शांत हो जाएं।
भद्रा के दौरान क्या करना चाहिए?- यदि भद्रा काल में कोई कार्य टालना संभव न हो, तो कुछ उपायों को अपनाकर उसके दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है:
दान और पूजाभद्रा के समय में काले तिल, काले कपड़े और लोहे का दान करना शुभ माना जाता है।
किसी गरीब या जरूरतमंद को भोजन कराना भी लाभकारी होता है।
मंत्र जाप करें ॐ विष्टिकायै नमः मंत्र का जप करें।
हनुमान चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी लाभदायक होता है।
आत्मचिंतन और साधना- भद्रा काल में ध्यान, योग और साधना करने से मानसिक शांति मिलती है।
भगवान शिव का ध्यान करना विशेष रूप से शुभ होता है।
निष्कर्ष- भद्रा का हिन्दू ज्योतिष में विशेष स्थान है। यह एक शक्ति है, जो अनुचित समय पर किए गए कार्यों को बाधित कर सकती है, परंतु उचित सम्मान और पूजा करने पर इसके दुष्प्रभाव शांत हो सकते हैं। शास्त्रों में दिए गए निर्देशों का पालन कर हम भद्रा के कुप्रभावों से बच सकते हैं और अपने जीवन सुखमय हो
इसलिए, भद्रा के समय में सावधानी बरतें, शुभ कार्यों को टालें और उचित उपायों से उसके कुप्रभावों से बचें।
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