सालासर बालाजी: एक दिव्य चमत्कार और भक्त मोहनदास जी की कथा
राजस्थान के चुरू जिले में स्थित सालासर बालाजी मंदिर भक्तों की आस्था और चमत्कारों का पवित्र केंद्र है। इस मंदिर की स्थापना और इसके चमत्कारी अस्तित्व की कहानी भक्त मोहनदास जी से जुड़ी हुई है। यह कथा न केवल उनकी निस्वार्थ भक्ति को दर्शाती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि श्रद्धा और समर्पण से भगवान स्वयं अपने भक्तों के समक्ष प्रकट होते हैं।
भक्त मोहनदास जी का जन्म और प्रारंभिक जीवन
सन् 1754 में, राजस्थान के सीकर जिले के रूल्याणी गांव में लच्छीरामजी पाटोदिया के घर एक दिव्य आत्मा ने जन्म लिया, जिन्हें आगे चलकर मोहनदास जी के रूप में जाना गया। बचपन से ही वे आध्यात्मिक झुकाव वाले थे और पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन में विशेष रुचि रखते थे। ज्योतिषियों ने उनके जन्म के समय ही भविष्यवाणी कर दी थी कि यह बालक आगे चलकर एक महान संत बनेगा।
मोहनदास जी की बहन कान्ही का विवाह सालासर गांव में हुआ था। दुर्भाग्यवश, उनके विवाह के कुछ ही समय बाद उनके पति का निधन हो गया, जिससे वे विधवा हो गईं। अपनी बहन और भांजे उदय की देखभाल के लिए मोहनदास जी सालासर आकर बस गए। उन्होंने अपनी मेहनत से खेती को समृद्ध बना दिया और अपने परिवार की स्थिति सुधार दी।
गड़ासे की रहस्यमय घटना
एक दिन, जब मोहनदास जी और उनके भांजे उदय खेत में काम कर रहे थे, तो अचानक उनके हाथ से गड़ासा (कृषि औजार) कोई अदृश्य शक्ति छीनकर दूर फेंक देती थी। कई बार ऐसा हुआ, जिसे देखकर उदय आश्चर्यचकित हो गया। मोहनदास जी ने इसे कोई दिव्य संकेत माना, लेकिन इस रहस्यमय घटना ने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया।
विवाह का प्रस्ताव और ब्रह्मचर्य व्रत
इस घटना के बाद उनकी बहन कान्ही ने सोचा कि शायद विवाह के बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा। जब उन्होंने अपने भाई के लिए विवाह का प्रस्ताव रखा, तो मोहनदास जी ने भविष्यवाणी की कि जिस लड़की से उनका विवाह तय होगा, उसकी मृत्यु हो जाएगी। आश्चर्यजनक रूप से, विवाह की चर्चा जिस कन्या से हो रही थी, उसकी अचानक मृत्यु हो गई। इसके बाद उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया और पूरी तरह भक्ति में लीन हो गए।
बालाजी का प्रथम दर्शन
एक दिन, जब मोहनदास जी अपने घर में भोजन कर रहे थे, तभी एक याचक (भिक्षुक) ने द्वार पर आकर भिक्षा मांगी। कान्ही जब द्वार पर पहुंची, तो वहां एक दिव्य परछाईं मात्र दिखी, जिसे देखकर वह स्तब्ध रह गईं। मोहनदास जी को समझ आ गया कि यह स्वयं बालाजी थे। कान्ही ने उनसे बालाजी के दर्शन कराने की प्रार्थना की, जिसे मोहनदास जी ने स्वीकार कर लिया।
कुछ समय बाद, एक दिन एक संत "नारायण हरि, नारायण हरि" का उच्चारण कर रहे थे। जैसे ही कान्ही ने यह सुना, वह दौड़ती हुई मोहनदास जी के पास गईं। जब मोहनदास जी बाहर आए, तो देखा कि वह साधु-वेशधारी कोई और नहीं, बल्कि स्वयं बालाजी थे। उन्होंने मोहनदास जी से कहा कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वे उनकी हर मनोकामना पूरी करेंगे। मोहनदास जी ने विनम्रतापूर्वक केवल एक ही प्रार्थना की – "मेरी बहन को आपके दर्शन प्राप्त हों"।
बालाजी ने यह स्वीकार कर लिया और कहा, "मैं एक पवित्र स्थान पर विराजमान रहूंगा और प्रसाद में मिश्री, खीर और चूरमे को ग्रहण करूंगा।"
बालाजी के सालासर में स्थायी निवास की भविष्यवाणी
इसके बाद बालाजी अंतर्ध्यान हो गए। मोहनदास जी गहरे ध्यान में चले गए और शमी वृक्ष के नीचे तपस्या करने लगे। कई लोगों ने उन्हें पागल समझा और "बावलिया बाबा" कहकर पुकारने लगे।
एक दिन, जब एक जाट युवक शमी वृक्ष के फल तोड़ने के लिए चढ़ा, तो वह भयभीत हो गया। मोहनदास जी ने उसे आश्वस्त किया कि जो भी इन फलों को खाएगा, वह जीवित नहीं रहेगा। जाट ने इसे मजाक में लिया और फल खा लिया, जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद, लोग मोहनदास जी को एक सिद्ध पुरुष मानने लगे।
डाकुओं का हमला और बालाजी का चमत्कार
उस समय सालासर, बीकानेर रियासत का हिस्सा था और ठाकुर धीरज सिंह यहां के शासक थे। एक दिन, उन्हें सूचना मिली कि डाकुओं का एक बड़ा दल गांव पर हमला करने वाला है। ठाकुर ने मोहनदास जी से रक्षा की प्रार्थना की।
मोहनदास जी ने कहा, "बालाजी का नाम लेकर डाकुओं की पताका को गिरा दो, विजय तुम्हारी होगी।" ठाकुर ने ऐसा ही किया, जिसके बाद डाकुओं की सेना पराजित हो गई। इस चमत्कार से ठाकुर और ग्रामीणों की श्रद्धा और भी प्रगाढ़ हो गई।
आसोटा में बालाजी की मूर्ति का प्रकट होना
उसी समय, आसोटा गांव में एक किसान हल चला रहा था। अचानक उसका हल किसी ठोस वस्तु से टकराया। जब उसने खुदाई की, तो वहां बालाजी की एक मूर्ति निकली।
इस मूर्ति को आसोटा के ठाकुर चंपावत सिंह ने अपनी हवेली में रख लिया। उसी रात, ठाकुर को स्वप्न में बालाजी ने आदेश दिया कि मूर्ति को सालासर पहुंचाया जाए। अगले ही दिन, पूरी भजन मंडली के साथ यह मूर्ति सालासर भेजी गई।
मूर्ति की स्थापना और सालासर धाम का उदय
जब सालासर में मूर्ति पहुंची, तो मोहनदास जी को बालाजी ने स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि वे अब इसी स्थान पर विराजेंगे। 1754 में, शुक्ल नवमी, शनिवार के दिन, विधि-विधान से सालासर बालाजी की मूर्ति की स्थापना की गई।
सालासर बालाजी के प्रसिद्ध मेले और दर्शन
आज सालासर बालाजी धाम श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। यहां तीन बड़े मेले लगते हैं:
चैत्र शुक्ल पूर्णिमा (हनुमान जयंती)
आश्विन शुक्ल पूर्णिमा
भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा
मोहनदास जी की समाधि
संवत 1850, वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को भक्त शिरोमणि मोहनदास जी समाधिस्थ हो गए। कहते हैं कि उस समय जल की फुहार के साथ पुष्पवर्षा हुई और बालाजी ने स्वयं उन्हें आशीर्वाद दिया।
आज भी सालासर बालाजी धाम में आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु यहां नतमस्तक होते हैं। यह स्थान भक्तों के लिए श्रद्धा, भक्ति और चमत्कारों का केंद्र बना हुआ है।
Jai bala ji
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